आज कल शांति
का भाव काफी
बढ़ गया है.
बेशकीमती, बहुमूल्य हो गयी
है. चाहे जन्हा
भी जाईये; ढूंढे
नहीं मिलती. यह
बहरूपिया भी है
और नौटंकी भी.
और जो जितने
पैसे वाला उसके
लिए उतनी ही
महंगी. किसी के
लिए कुछ और
किसी और के
लिए और कुछ.
चाहे सात सितारा
(सेवेन स्टार) होटल हो
या कॉर्बेट टाइगर
रिज़र्व, माँ वैष्णव
देवी का मंदिर
हो या भोले
बाबा का डेरा;
कंही भी नहीं
मिलती. मुझे तो
ये समझ नहीं
आता की शांति
के साथ समस्या
क्या है? आखिर
शांति आयेगी कैसे?
मिलेगी कंहा? क्या बन्दुक
की नोक पर
आयेगी? तोप के
गोले से डर
जाएगी? धरना प्रदर्शन
से आयेगी? होटलों
में सेमिनार और
प्रेस कांफ्रेंस करने
पर आयेगी? या
फिर किसी बाबा
जी के हवंन
पूजन से खुश
होकर हवन कुंड
से ही प्रगट
हो जाएगी? विगत
वर्षों में लोगों
ने बहुत उपाय
किये हैं -- विदेश
यात्रा पर गए,
किस्म किस्म के
उपासना घर बनवाये,
और न जाने
क्या क्या जुगत
लगायी, पर शांति
न मिल पाई.
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Wednesday, February 13, 2013
Tuesday, November 20, 2012
शांति की खोज
इन दिनों शर्मा जी
काम की पीड़ा से त्रस्त थे. किन्तु ध्यान दीजियेगा: यंहा काम का अर्थ 'काम' नहीं बल्कि
कार्य है. वैसे तो काम शर्मा जी का प्रिय कार्य है...भला ये उससे कैसे पीड़ित हो सकते
हैं. यदि अभी भी बात आपके पल्ले नहीं पड़ी तो मैं कुछ नहीं कर सकता; हाँ यह सलाह अवश्य
दे सकता हूँ की वात्स्यायन कृत कामसूत्र को याद करिए. याद आ गया न? क्या करियेगा इसमें
आपका दोष नहीं है; यह तो हमारी मातृभाषा हिंदी की दुर्दशा है. वह दिन दूर नही जब मातृभाषा
की ही तरह लोग अपने माँ और बाप को भूल जायेंगे. खैर यंहा इन बातों का कोई औचित्य नहीं
है और अलग हम अपने मुद्दे से भटक रहे हैं.
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