जाड़े की अलसाई सुबह थी. धुंध की घनी चादर के पीछे छिपे कालजयी किले का वास्तविक रूप अभी भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था. वैभव, विनाश, जय-पराजय, रास-रंग और कई रक्तपात का गवाह रही इसकी मौन दीवारें न जाने लाल पत्थरों के पीछे अभी और कितने राज छिपा रखी होंगी. ग्यारह बज चुके थे, और किले के ठीक सामने, सड़क पर बसे बीहड़ बाज़ार की गलियों में आने जाने वालों की संख्या बढ़ने लगी थे. यंहा लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की धुप है या छाँव, धुंध है या बतास; उन्हें तो अपना काम करना है. दो चार से ज्यादा पैसे कमाने हैं. रिक्शा, ठेला, ऑटो, कार. सबकी के रेलम पेल. शोरगुल. लोगों का निरंतर आना और जाना. लोग आ रहे हैं. जितने आ रहे हैं उससे दो गुने जा रहे है. लेकिन सभी भीड़ है. भीड़ का हिस्सा. यंहा सभी की पहचान भीड़ के रूप में होती है.
Wednesday, April 10, 2013
Wednesday, February 13, 2013
क्या करे शांति? कंहा जाये शांति?
आज कल शांति
का भाव काफी
बढ़ गया है.
बेशकीमती, बहुमूल्य हो गयी
है. चाहे जन्हा
भी जाईये; ढूंढे
नहीं मिलती. यह
बहरूपिया भी है
और नौटंकी भी.
और जो जितने
पैसे वाला उसके
लिए उतनी ही
महंगी. किसी के
लिए कुछ और
किसी और के
लिए और कुछ.
चाहे सात सितारा
(सेवेन स्टार) होटल हो
या कॉर्बेट टाइगर
रिज़र्व, माँ वैष्णव
देवी का मंदिर
हो या भोले
बाबा का डेरा;
कंही भी नहीं
मिलती. मुझे तो
ये समझ नहीं
आता की शांति
के साथ समस्या
क्या है? आखिर
शांति आयेगी कैसे?
मिलेगी कंहा? क्या बन्दुक
की नोक पर
आयेगी? तोप के
गोले से डर
जाएगी? धरना प्रदर्शन
से आयेगी? होटलों
में सेमिनार और
प्रेस कांफ्रेंस करने
पर आयेगी? या
फिर किसी बाबा
जी के हवंन
पूजन से खुश
होकर हवन कुंड
से ही प्रगट
हो जाएगी? विगत
वर्षों में लोगों
ने बहुत उपाय
किये हैं -- विदेश
यात्रा पर गए,
किस्म किस्म के
उपासना घर बनवाये,
और न जाने
क्या क्या जुगत
लगायी, पर शांति
न मिल पाई.
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