आज कल शांति
का भाव काफी
बढ़ गया है.
बेशकीमती, बहुमूल्य हो गयी
है. चाहे जन्हा
भी जाईये; ढूंढे
नहीं मिलती. यह
बहरूपिया भी है
और नौटंकी भी.
और जो जितने
पैसे वाला उसके
लिए उतनी ही
महंगी. किसी के
लिए कुछ और
किसी और के
लिए और कुछ.
चाहे सात सितारा
(सेवेन स्टार) होटल हो
या कॉर्बेट टाइगर
रिज़र्व, माँ वैष्णव
देवी का मंदिर
हो या भोले
बाबा का डेरा;
कंही भी नहीं
मिलती. मुझे तो
ये समझ नहीं
आता की शांति
के साथ समस्या
क्या है? आखिर
शांति आयेगी कैसे?
मिलेगी कंहा? क्या बन्दुक
की नोक पर
आयेगी? तोप के
गोले से डर
जाएगी? धरना प्रदर्शन
से आयेगी? होटलों
में सेमिनार और
प्रेस कांफ्रेंस करने
पर आयेगी? या
फिर किसी बाबा
जी के हवंन
पूजन से खुश
होकर हवन कुंड
से ही प्रगट
हो जाएगी? विगत
वर्षों में लोगों
ने बहुत उपाय
किये हैं -- विदेश
यात्रा पर गए,
किस्म किस्म के
उपासना घर बनवाये,
और न जाने
क्या क्या जुगत
लगायी, पर शांति
न मिल पाई.
अब भैया कॉमन
सेंस टाइप की
भी कोई चीज़
होती है. एक
अकेली शांति किसके
किसके पास जायेगी?
कंहा कंहा जाएगी?
कुछ वर्ष पहले
तक कुछेक जगहें
थीं जंहा शांति
की उपस्थिति दर्ज
की जाती थी;
किन्तु धीरे धीरे
कुछ अशांत टाइप
के लोगों को
इस बात का
पता लग गया,
और वो झुण्ड के
झुण्ड, बसों में,
रेल गाड़ी से,
हवाई जहाज से
वंहा पहुँचने लगे.
फिर क्या था;
शांति कट ली.
और करती भी
क्या, उसके चाहने
वाले लांखो की
संख्या में पहुचने
लगे थे. गोवा
का यही हुआ.
ऋषिकेश का यही
हुआ. केरल और
कश्मीर तो पूरा
धंधा ही है.
कुछ वर्ष पूर्व
मेरा साक्षात्कार शांति
से हो गया
-- दक्षिण भारत के
एक सुदूर मछुवारों
के गाँव में.
वंहा कुछ भी
नहीं था. दस-पांच मछुवारों
का घर, समुद्र
तट पर राखी
उनकी उलटी-सीधी
नावें. लम्बे और संकरे
बीच (beach) के साथ
चलते, हवा के
साथ इठलाते कासुरिना
और नारियल के
पेड़ों की लम्बी
कतारें कहीं से
भी इहलौकिक नहीं
थी. यह गाँव
एक स्वप्न के
सामान था -- एक
ऐसा अच्छा सपना
जिसे आप कभी
भी नहीं भूलना
चाहेंगे. शांति मुझे इस
गाँव में देखकर
घबरा गई. वह
समझ गयी की
मैं इस गाँव
का नहीं. उसके
श्वेत, शांत चेहरे
पर परेशानी की
रेखाएँ दिख रहीं
थी.
शांति ने मुझसे
पूछ ही लिया,
"तुम तो यंहा
के नहीं. यंहा
कैसे आना हुआ?"
मैं चुप रहा.
शांति के चेहरे
को पढने की
कोशिश कर रहा
था. गहरे हरे
रंग के कैसुरिना,
नीले नभ, नीले
सागर, लाल रेतीले
तट और इन
सभी के बीच
एक दैवीय रूप,
ऐसा दृश्य था
मानो प्रकृति ने
अपना सारा सौंदर्य
यंही उढेल दिया
हो. मैंने गहरी
साँस छोड़ते हुए
बोल, "मैं खुद
को ढूँढता यंहा
चला आया हूँ."
यद्दपि मेरी गर्दन
निचे बालू पर
भागते केकड़े की
ओर थी, किन्तु
आंखे अभी भी
शांति के चेहरे
से पूरी तरह
से हट नहीं
पाई थीं. अपनी
तिरछी, घूरती निगांहो से
मैंने जवाब दिया,
"आप घबराइए नहीं, मैं
किसी को नहीं
बताऊंगा की आप
यंहा हैं."
थोडा रूककर मैं बोल,
"वैसे आप जगह
अच्छी चुनती हैं."
उनके होठों पर
हल्की सी मुस्कान
बिखर गयी.
शांति से मैं
कई बातें करना
चाहता था. मैंने
फिर बोला, "सालो
पहले आप ही
के नाम पर
एटम बम फोड़ा
गया था. अब
आप ही के
नाम पर सीमा
के आर पार
बातें चल रही
हैं. सेमिनार, कांफ्रेंस
किये जा रहे
हैं. कबूतर उड़ाए
जा रहे हैं.
दिया अगरबत्ती जलाई
जा रही है.
चादरें चढ़ाई जा
रही हैं. सारे
तरीके अपनाये जा
रहे हैं ताकि
आप लोगों के
बीच, देशों के
बीच छा जायें.
क्या आप को
नहीं लगता की
अपने अज्ञातवास को
समाप्त करने का
वक़्त आ गया
है? अगर अपने
ऐसा नहीं किया
तो अनर्थ होगा.
मार्किट में आपकी
डुप्लीकेट कॉपी आ
जाएगी. लोग आपके
नाम पर फ्रैंचाइज़ी
चलने लगेंगे. पीस
स्टडी तो वर्षों
से चल रही
है और चलने,
पढ़ाने और पढ़ने
वाले सबसे ज्यादा
अशांति फैलाते हैं. आप
(शांति शब्द) का नाम
कई लोगों का
धंधा बन गया
है. पूरी शांति
उद्योग (पीस इंडस्ट्री)
स्थापित हो चूका
है जो इस
पवित्र शब्द के
विभिन्न आयामों तक फैला
हुआ है. "
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