Saturday, December 22, 2012

भारत दुर्दशा

मौलिक रूप से यह शीर्षक हिंदी भाषा के महाकवि और प्रथम नाटककार श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम दर्ज है; किन्तु आज इस शीर्षक को मैं खुल्ले में और बड़ी बेशर्मी के साथ उठाकर अपने नाम के साथ लिख रहा हूँ. चोरी-चकारी, हत्या-बलात्कार, छिनताई-घूसखोरी, ठगी-धोखाधडी, इत्यादि हम भारतियों का मौलिक गुण बन चुका हैं. आधी से ज्यादा बॉलीवुड चोरी-चकारी पर ही जिंदा है और बड़े ताव से है. अगर इसी में दो शब्द मैंने चुरा लिए तो क्या क़यामत आ जाएगी? बेशक नहीं. आज यदि भारतेंदु होते तो निःसंदेह फिर से वही नाटक लिखते, जो उन्होंने लगभग 135 वर्ष पहले लिखा था.