मौलिक रूप से यह शीर्षक हिंदी भाषा के महाकवि और प्रथम नाटककार श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम दर्ज है; किन्तु आज इस शीर्षक को मैं खुल्ले में और बड़ी बेशर्मी के साथ उठाकर अपने नाम के साथ लिख रहा हूँ. चोरी-चकारी, हत्या-बलात्कार, छिनताई-घूसखोरी, ठगी-धोखाधडी, इत्यादि हम भारतियों का मौलिक गुण बन चुका हैं. आधी से ज्यादा बॉलीवुड चोरी-चकारी पर ही जिंदा है और बड़े ताव से है. अगर इसी में दो शब्द मैंने चुरा लिए तो क्या क़यामत आ जाएगी? बेशक नहीं. आज यदि भारतेंदु होते तो निःसंदेह फिर से वही नाटक लिखते, जो उन्होंने लगभग 135 वर्ष पहले लिखा था.
भारतेंदु जी ने जब 'भारत दुर्दशा' की रचना की थी, देश गुलाम था. अंग्रेजो के अधीन था. आकाल, भुखमरी, कुपोषण और महामारी आम थी. समाज दो भागो में बंटा हुआ था -- अंग्रेजो के तलवे चाटते जमींदार और रजवाड़े और एक वक़्त की रोटी के मुंह जोहते गरीब किसान, भूमिहीन मजदुर. दलितों (हालाँकि यह नया शब्द है) की अवस्था हमारे लिए अकल्पनीय है. ज़मींदारी, रैयतवारी और महलवारी व्यवस्था ने लोंगो की ज़िन्दगी नरक कर रखी था. एक महामारी आई और पूरा गाँव साफ़. सफाचट. गिने चुने भाग्यशाली बच जाये तो अपने प्रियजनों की अन्तेश्थी कर दी. यद्यपि भारतेंदु जी को गुजरे 129 और अंग्रेजो को भारत छोड़े 65 वर्ष हो चुके है, लेकिन हमारे देश में परिस्थियाँ बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं. वे जस की तस वैसे ही खड़ी हैं. खड़ी नहीं हैं तो पड़ी हैं और कभी भी खड़ी हो सकती हैं. गरीबी वैसे की वैसे ही है. कुपोषण वैसा ही है. सामाजिक पिछड़ापन तो आप जानते ही हैं. किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की इनकी गहनता (इंटेंसिटी) में फ़र्क आया है. लेकिन बात ये भी है की 50 वर्ष पूर्व जो देश हमसे पिछड़े थे, आज वो हमसे आगे हैं. 1980 के दशक में भारत में प्रति व्यक्ति आय $370 जबकि चीन में $450 थी. आज चीन हमसे बहुत आगे है. दोनो के बीच का फासला बहुत ज्यादा है. वह शीर्ष पर है तो हम गर्त में. एक आंकड़े के अनुसार २०११ में भारत की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय $1527 थी जबकि चीन की $2634. फर्क आप समझ सकते हैं. क्या आज कोई इस बात की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है की हम क्यों नहीं चीन की बराबरी कर पा रहे हैं; जबकि आज से ६० वर्ष पूर्व दोनों की स्थिति लगभग बराबर थी? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
हाँ आप यह तर्क दे सकते हैं की हम भारतियों के पास आज़ादी ज्यादा है. पर किसलिए? कंही भी थूक देने के लिए. खुले में मूत देने के लिए. किसी को भी गली दे देने के लिए. और थोडा ज्यादा मनबढ़ हो तो किसी का भी बलात्कार कर देने के लिए, किसी की भी हत्या कर देने के लिए. देश आजाद हुआ. गोरे भाग गए. उनकी जगह भूरे और काले ने ले ली; सत्ता से जोंक की तरह चिपक गए; जनता का खून चूसने के लिए. हमारे खोपड़े पर बैठकर मुतने के लिए. अब भैया नीचे रहोगे तो ऊपर की गंध तो झेलनी ही पड़ेगी. पहले के सफ़ेदपोश चोरों में शर्म थी. कम से कम दिन में गंदिगी नही करते थे. जो भी करना होता था, लोगो की नज़रों से बच कर रात के अँधेरे में करते थे. लेकिन समय बदला. नैतिकता बदली. पार्टी बदली. पहनावा बदला. बोलचाल बदली. ठाठ बदली. सर्फ़ का ज्यादा इस्तेमाल किया, लेकिन सफेदी जाती रही; चेहरे का पानी कम होता गया. और अब तो नाक से ऊपर होने लगा है. अब सफेदपोश लोग बड़ी बेशर्मी से अपनी नंगई दिखाते हैं -- कभी संसद में, कभी सड़क पर, कभी टीवी पर तो, तो कभी बंद कमरे में छुपे हुए कैमरे के सामने. इन्ही नंगो के कारण आज पूरा देश शर्मसार है. अगर आपको शर्म नहीं आती तो अपने पेशे के बारे में जरुर पुनर्विचार करें.
महंगे कॉटन साडी में लिपटी एक नेत्री आज टीवी पर घडियाली आंसू बहा रही थी. ना जाने इस पर कितने पैसो का लेंना-देंना हुआ होगा. खैर वो ये भूल गयी की उसका काम लोंगो के आंसू पोंछना है बहाना नहीं. वो एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं.
भारतेंदु जी ने जब 'भारत दुर्दशा' की रचना की थी, देश गुलाम था. अंग्रेजो के अधीन था. आकाल, भुखमरी, कुपोषण और महामारी आम थी. समाज दो भागो में बंटा हुआ था -- अंग्रेजो के तलवे चाटते जमींदार और रजवाड़े और एक वक़्त की रोटी के मुंह जोहते गरीब किसान, भूमिहीन मजदुर. दलितों (हालाँकि यह नया शब्द है) की अवस्था हमारे लिए अकल्पनीय है. ज़मींदारी, रैयतवारी और महलवारी व्यवस्था ने लोंगो की ज़िन्दगी नरक कर रखी था. एक महामारी आई और पूरा गाँव साफ़. सफाचट. गिने चुने भाग्यशाली बच जाये तो अपने प्रियजनों की अन्तेश्थी कर दी. यद्यपि भारतेंदु जी को गुजरे 129 और अंग्रेजो को भारत छोड़े 65 वर्ष हो चुके है, लेकिन हमारे देश में परिस्थियाँ बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं. वे जस की तस वैसे ही खड़ी हैं. खड़ी नहीं हैं तो पड़ी हैं और कभी भी खड़ी हो सकती हैं. गरीबी वैसे की वैसे ही है. कुपोषण वैसा ही है. सामाजिक पिछड़ापन तो आप जानते ही हैं. किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की इनकी गहनता (इंटेंसिटी) में फ़र्क आया है. लेकिन बात ये भी है की 50 वर्ष पूर्व जो देश हमसे पिछड़े थे, आज वो हमसे आगे हैं. 1980 के दशक में भारत में प्रति व्यक्ति आय $370 जबकि चीन में $450 थी. आज चीन हमसे बहुत आगे है. दोनो के बीच का फासला बहुत ज्यादा है. वह शीर्ष पर है तो हम गर्त में. एक आंकड़े के अनुसार २०११ में भारत की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय $1527 थी जबकि चीन की $2634. फर्क आप समझ सकते हैं. क्या आज कोई इस बात की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है की हम क्यों नहीं चीन की बराबरी कर पा रहे हैं; जबकि आज से ६० वर्ष पूर्व दोनों की स्थिति लगभग बराबर थी? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
हाँ आप यह तर्क दे सकते हैं की हम भारतियों के पास आज़ादी ज्यादा है. पर किसलिए? कंही भी थूक देने के लिए. खुले में मूत देने के लिए. किसी को भी गली दे देने के लिए. और थोडा ज्यादा मनबढ़ हो तो किसी का भी बलात्कार कर देने के लिए, किसी की भी हत्या कर देने के लिए. देश आजाद हुआ. गोरे भाग गए. उनकी जगह भूरे और काले ने ले ली; सत्ता से जोंक की तरह चिपक गए; जनता का खून चूसने के लिए. हमारे खोपड़े पर बैठकर मुतने के लिए. अब भैया नीचे रहोगे तो ऊपर की गंध तो झेलनी ही पड़ेगी. पहले के सफ़ेदपोश चोरों में शर्म थी. कम से कम दिन में गंदिगी नही करते थे. जो भी करना होता था, लोगो की नज़रों से बच कर रात के अँधेरे में करते थे. लेकिन समय बदला. नैतिकता बदली. पार्टी बदली. पहनावा बदला. बोलचाल बदली. ठाठ बदली. सर्फ़ का ज्यादा इस्तेमाल किया, लेकिन सफेदी जाती रही; चेहरे का पानी कम होता गया. और अब तो नाक से ऊपर होने लगा है. अब सफेदपोश लोग बड़ी बेशर्मी से अपनी नंगई दिखाते हैं -- कभी संसद में, कभी सड़क पर, कभी टीवी पर तो, तो कभी बंद कमरे में छुपे हुए कैमरे के सामने. इन्ही नंगो के कारण आज पूरा देश शर्मसार है. अगर आपको शर्म नहीं आती तो अपने पेशे के बारे में जरुर पुनर्विचार करें.
महंगे कॉटन साडी में लिपटी एक नेत्री आज टीवी पर घडियाली आंसू बहा रही थी. ना जाने इस पर कितने पैसो का लेंना-देंना हुआ होगा. खैर वो ये भूल गयी की उसका काम लोंगो के आंसू पोंछना है बहाना नहीं. वो एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं.
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