इन दिनों शर्मा जी
काम की पीड़ा से त्रस्त थे. किन्तु ध्यान दीजियेगा: यंहा काम का अर्थ 'काम' नहीं बल्कि
कार्य है. वैसे तो काम शर्मा जी का प्रिय कार्य है...भला ये उससे कैसे पीड़ित हो सकते
हैं. यदि अभी भी बात आपके पल्ले नहीं पड़ी तो मैं कुछ नहीं कर सकता; हाँ यह सलाह अवश्य
दे सकता हूँ की वात्स्यायन कृत कामसूत्र को याद करिए. याद आ गया न? क्या करियेगा इसमें
आपका दोष नहीं है; यह तो हमारी मातृभाषा हिंदी की दुर्दशा है. वह दिन दूर नही जब मातृभाषा
की ही तरह लोग अपने माँ और बाप को भूल जायेंगे. खैर यंहा इन बातों का कोई औचित्य नहीं
है और अलग हम अपने मुद्दे से भटक रहे हैं.
जन्हा सारी दुनिया
नवरात्र मैं व्यस्त थी, दुर्गा पूजा की taiyariyan कर रही थी, रास डंडिया खेल रही थी,
और रावन वध देखने का प्लान बना रही थी वन्ही बेचारे शर्मा जी टका सा मुंह लेकर अपने
कंप्यूटर स्क्रीन पर निगाह गडाए कार्य कर रहे थे और साथ ही साथ अपनी किस्मत को भी कोस
रहे थे, "रेस्सला कहा फंसा हुआ हूँ, सारी
दुनिया मौज कट रही है और मैं यंहा अकेला बैठा..." वैसे शर्मा जी पूरी तरह
से निराश नहीं थे. अभी आगे एक दो छुटिया आ रही थी और काम खत्म हो जाने पर एक दो और
अतिरिक्त दिन मिल जाने की आशा थी. कभी कभी कुछ गुनगुनाते हुए, कुछ कुछ काम करते हुए,
मन ही मन छुटिया प्लान करने लगे, "कंही ऐसी जगह चला जाये जन्हा निपट शांति हो,
कोई शोर शराबा न हो कोई भीड़ न हो, जन्हा काम काज से दूर एक दो दिन शांति के गुजरे जा
सके." धीरे धीरे शर्मा जी कल्पना का दायरा
बढ़ता गया -- वह भारतवर्ष में शांति की खोज की योजना बनाने लगे. बेचारे शर्मा जी! क्या
शांति इतनी सस्ती है किए कंही भी ऐसे ही कड़ी या पड़ी मिल जाये? बहुत सोचने विचारने की
बाद इन्होने एक दो दिनों के लिए ऋषिकेश भ्रमण का प्लान बनाया. आज से लगभग २० साल पहले
ये ऋषिकेश जाये थे, जगह बहुत पसंद आयी थी. आज जबकी वो काफी थके और कम के बोझ तले दबे
थे, शर्मा जी ने सोचा क्यों न ऋषिकेश ही चला जाये -- वन्ही माँ गंगा के तट पर जा कर
बैठा जाये, सुबह और शाम की आरती का आनंद लिया जाये, वन्ही मुनि की रेती के आगे ठन्डे
भीगे बालू पर बैठकर ध्यान किया जाये; सब कुछ कितना सुखद, शांत और आनंददायक है. सुबह
सुबह ऊंचे पहाड़ो से निचे सरकती हुई ठंडी हवा में सैर करना, वन्ही राम झूले के ठीक निचे
बने चबूतरे पर बैठकर सूर्यास्त के मनोरम दृश्य का अवलोकन करना; और यू ही बिना वजह,
निरोद्द्येश गंगा के किनारे किनारे चलते हुए आगे बने बैराज तक निकल जाना और अगर भाग्य
अच्छा रहा तो गंगा के उस पर जंगले की तरफ हाथियों के झुण्ड को पानी में खेलता देखते
रहना. सभी कुछ कितना स्वप्ना सदृश प्रतीत हो रहा था, इसी आदर्श तस्वीर को मन में बसाये
शर्मा जी ऋषिकेश पहुँच गए.
आज से २० वर्ष पूर्व
जब शर्मा जी ऋषिकेश आये थे तब उनका अनुभव अभूतपूर्व रहा था. उसकी याद इनके मन में अभी
भी ताज़ा थी. उन्ही यादो को दिल में संजोय, फिर से उसी अनुभूति के लिए पुन: उन्ही रास्तो,
उन्ही पुलों, उन्ही चौराहों और उन्ही चाय की दुकानों से होकर गुज़ारना चाहते थे. पवित्र
पावनी गंगा, सैकड़ो मंदिरों और हजारो आश्रमों वाले इस स्थल पर उन्हें उम्मीद थी की शांति
जरूर मिलेगी.
शर्मा जी ने तडके ही
दिल्ली छोड़ दिया था और दोपहर की प्रथम घडी की प्रथम प्रहार में ही लक्ष्मण झुला के
पास स्थित एक ठीक ठाक, साफ सुथरे होटल की धेयोड़ी पर दस्तक दे दी. शर्मा जी सीधे जा
कर रिसेप्शन की मेज के आगे खड़े हो गए. लेकिन वंहा कोई भी नहीं था. एक दो मिनट वन्ही
खड़े रहे. थोडा इधर उधर देखा. लेकिन फिर भी कोई नज़र नहीं आया. यंहा पूरी शांति थी. शर्मा
जी थोडा आगे बढे...गैलेरी की तरफ झाँका; पर वंहा भी कोई नहीं था -- एक परिंदा भी नहीं..न
ही तितलिया और न ही मछर. निपट शांति थी यंहा. मनो जिस चीज़ की तलाश शर्मा जी को थी वो
तुरन्त ही मिल गयी. तभी दूर कोने में बने रेस्तरां के अधखुले दरवाजे से भागता हुआ एक
लड़का चला आ रहा था. उम्र होगी कोई यही १९-२० वर्ष, औसत ऊंचाई थी, रंग साफ़ था, शारीर
दुबला पतला थोडा कुपोषित टाइप था. लेकिन आँखों में एक चमक थी और होठों पर एक स्वाभाविक
मुस्कान. संभवतः यह मुस्कान उसकी पेशागत जरूरत थी जो अब सदा उसके चेहरे पर चिपकी रहती
थी; परिस्थिया चाहे जो भी हों. लकड़े के पैरों
की गति से ऐसा प्रतीत हो रहा था की किसी ने बहुत दिनों बाद इस होटल को मेजबानी का अवसर
दिया था, और यह लड़का उसपर पूरा खरा उतरना चाहता था. शर्मा जी ने अपना परिचय दिया, होटल
के रजिस्टर में अपनी एंट्री की, पहचान पत्र की प्रतिलिपि दी, और दो दिन का एडवांस जमा
कर दिया. जब से देश में आतंकवाद और अशांति ने अपने पाँव पसारे घुमने फिरने पर कई प्रकार
के अंकुश लगते जा रहे है. अभी हमारे ही देश में ऐसी कई जगहे है जन्हा जाने की कल्पना
भी आप नही कर सकते. वजह? जमीं के ठीक डेढ़ फूट निचे बारूदी सुरंग का बिछा होना.
कमरा न. १०१ में प्रवेश
करते ही शर्मा जी ने सामान एक कोने में फेंक दिया, टीवी ओंन कर समाचार लगाया और बाथरूम
में हाथ मुंह धोने चले गए. इन सभी काम को निपटने में दोपहर के डेढ़ बज गए थे. शर्मा जी में थकान का नाम निशान नहीं था, बस थोड़ी
भूख लगी हुई थी सो रेस्तरां के दरवाजे पर खड़े उसी लड़के से पूछ लिया, "भाई खाने
में कुछ मिलेगा क्या." लड़के ने मुस्कुराते हुए रेस्तरां के अन्दर आने के लिए कहा.
रेस्तरां ज्यादा बड़ा नहीं था. तीन चार टेबल लगे हुए थे और हर टेबल के साथ छह कुर्सियां
लगी हुई थी. वन्ही शीशे के विशाल दरवाजे के कोने में ऊपर टीवी लगी थी जिसमे ९० के दशक
की कोई घटिया फिल्म चल रही थी. हवा थोड़ी ठंडी थी पर धुप पूरी खिली हुई थी और रेस्तरां
के अन्दर से बहार होटल के लॉन का नज़ारा अच्छा लग रहा था. ऊँचे ऊँचे पाम ट्रीज, बगल में ही लगे हुए विलो ट्रीज,
और थोड़ी कम ऊंचाई पर ज़मीन के पास खिले हुए रंग बिरंगे फूल और दूर तक सड़क नज़र आ रही
थी. ये सड़क आगे माना गाँव तक जा रही थी. माना गाँव बद्रीनाथ से आगे इस सड़क पर आखरी
गाँव और भारत चीन बोर्डेर इस गाँव से थोड़ी ही दुरी पर है. शर्मा जी सबसे सामने वाले
टेबल के साथ ली कुर्सी पर बैठ गए. यंहा से बहार का पूरा नज़ारा दिख रहा था. यह अलग बात
है की इस पुरे दृश्य में ह्यूमन एलिमेंट के नाम पर यही लड़का था और शांति थी. बीच बीच
में मोटर गाडी की घरघराहट शांति भंग कर रही थी. इसी बीच लड़के ने ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक
से लैमिनेटेड मेनू कार्ड शर्मा जी को थमा दिया. इस कार्ड में न केवल रेस्तरां में उपलब्ध
सभी मेनू थे बल्कि उसके सैंपल भी चस्पा थे. कंही सब्जी की दाग लगी थी तो कंही दाल गिरी
हुई थी, कंही चाय का धब्बा लगा था तो कंही मक्खन का अतिरेक अपनी उपस्थिति दर्ज करा
रहा था. कुल मिला जुलाकर कार्ड ऐसा था की किसी को कार्ड पढने की ज़रूरत नहीं थी. शर्मा
जी समझदार इन्सान थे. ऐसी जगह पर जन्हा ज्यादा आने जाने वालों की संख्या नहीं थी, रिस्क
लेना नहीं चाहते थे. चुपचाप कह दिया जो कुछ भी ताजा हो ले आओ. लड़के ने कहा, "यंहा
सभी चीजे ताज़ी ही मिलती ही, आप बताओ क्या खाओगे." शर्मा जी फिर कहा, "भाई
आलो की सब्जी और रोटी ले आ." अब तक लड़के की निगाह शर्मा जी से हट कर बाहर लॉन
की ओर अटक गयी थी. उसका ध्यान शर्मा जी पर नहीं था. उसकी निगाह उन दो लड़िकयों पर टिक
गयी थी जो अपने कमरों से बाहर आ कर धूप में अपने भीगे बाल सुखा रही थी. उनके भीगे बालों
से अभी भी पानी की बूंदे टपक कर अंगवस्त्रो को गिला कर गीला कर रही थी. शर्मा जी अपना
महत्व खोता देख थोडा गुर्राते हुए कहा, "जा जो है वाही ले आ, और हो तो रीता भी
ले आना." लड़के ने अपनी कतिपय चलने वाली पेन से आर्डर लिखा और आर्डर ले कर पीछे
बने किचेन की ओर चला गया. शर्मा जी ने रिमोट लेकर टीवी का चैनल चेंज कर फिर से न्यूज़
लगा दिया और दिन दुनिया का हाल चाल देखने लगे. लड़का वापस आकर रेस्तरां के बहार खम्भे
से टिककर खड़ा हो गया. लड़कियां अभी भी धूप सेंक रही थी. और होटल में पूरी शांति थी.
थोड़ी देर बाद शर्मा जी ने बिना शांति भंग करते हुए न खाने योग्य खाने को खा कर शांति
की तलाश में बहार निकल पड़े.
शर्मा जी जन्हा रुके
थे वंहा कोई सवारी नहीं मिलती है. जितनी भी जीप और बसें निकलती है सभी लम्बी दूरी की
होती हैं. इसलिए शर्मा जी पैदल ही निकल पड़े थे. रस्ते के किनारे हरियाली की जगह धुल
ज्यादा थी और पहाड़ो की तारो ताज़ा हवा की जगह सड़ांध नक् में दम किये जा रही थी. तभी
भी सड़क पर तेज भागती जीपों और सड़क की रौंदती बसों से खुद को बचाते हुए शर्मा जी सर्पीले
रस्ते पर चले जा रहे थे. थोड़ी दूर जाकर उन्होंने एक पतली गली पकड ली जो सीधे निचे की
तरफ गंगा जी की ओर जाती है. इस रस्ते के सहारे बहता एक खुला बदबूदार नाला उनका साथी
रहा. पुरे रस्ते हर घर में आश्रम खुले थे और हर घर में योग की शिक्षा दी जा रही थी;
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा का पूरा ऋषिकेश शहर योगियों का हो. यंहा गंगा में पानी
और पत्थरों से ज्यादा दुकानजुमा आश्रम हैं जन्हा अध्यात्म का व्यापर होता है. संभवतः और भी कई व्यापर चलते होंगे जो हमारे संज्ञान
से बहार हैं.
शर्मा जी की साँस,
परछाई और नाला साथ साथ चल रहे थे. किन्तु ये अतिरेक काफी कष्टप्रद था. लगातार निचे
उतरने के बाद पतली गली दो फाड़ हो गयी -- एक दाहिनी तरफ और गंदे रस्ते में जा मिली तो
दूसरी एक चौड़ी सड़क में समां गयी. यंही पर नाले ने शर्मा जी का साथ छोड़ दिया और उसकी
जगह फिर से जीप, कार, मोटरसाइकिल्स, और असंख्य सजीव नरमुंडो ने ले ली. दिन दशाहरे और
दुर्गा पूजा विसर्जन का था. स्वाभाविक है की ऐसी पारिस्थि में शान्ति की कल्पना करना
दिवास्वप्न से कम या ज्यादा कुछ भी नही था. यंहा बात न बनती देख शर्मा जी लक्ष्मण झुला
के सहारे गंगा के उस पर चले गए. लेकिन यंहा का नज़ारा और बुरा था. जन्हा पहले लोग केवल
पैदल आना जाना करते थे वंहा अब गाड़िया ही गाड़िया थी. शांत वातावरण, शुद्ध वायु, और
निर्मल जाल सभी नदारद थे. निचे गंगा जी में लोगों ने बड़ी बेशर्मी से गन्दगी फेक राखी
थी. शर्मा जी पूरे दो दिन रिस्केश में शांति ढूंडन में बिताये. हर जगह गए. लेकिन कंही
वयापार मिला तो कंही व्यभिचार. जो न मिली वो थी शांति. न ही वो अन्दर थी और न ही बाहर.
शर्मा जी जैसे जीवत वाले आदमी को 'योग की राजधानी' में तो शांति नहीं मिली. जाईये आप
ही देख आईये यदि आप को मिल जाये. हाँ अगर मिले तो मुझे भी बताईगा. तब तक मैं भी ढूढता
हूँ. जय हिन्द.
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