Wednesday, April 10, 2013

२१वी सदी का महाराणा प्रताप

जाड़े की अलसाई सुबह थी. धुंध की घनी चादर के पीछे छिपे कालजयी किले का वास्तविक रूप अभी भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था. वैभव, विनाश, जय-पराजय, रास-रंग और कई रक्तपात का गवाह रही इसकी मौन दीवारें न जाने लाल पत्थरों के पीछे अभी और कितने राज छिपा रखी होंगी. ग्यारह बज चुके थे, और किले के ठीक सामने, सड़क पर बसे बीहड़ बाज़ार की गलियों में आने जाने वालों की संख्या बढ़ने लगी थे. यंहा लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की धुप है या छाँव, धुंध है या बतास; उन्हें तो अपना काम करना है. दो चार से ज्यादा पैसे कमाने हैं. रिक्शा, ठेला, ऑटो, कार. सबकी के रेलम पेल. शोरगुल. लोगों का निरंतर आना और जाना. लोग आ रहे हैं. जितने आ रहे हैं उससे दो गुने जा रहे है. लेकिन सभी भीड़ है. भीड़ का हिस्सा. यंहा सभी की पहचान भीड़ के रूप में होती है.