Tuesday, November 20, 2012

शांति की खोज

इन दिनों शर्मा जी काम की पीड़ा से त्रस्त थे. किन्तु ध्यान दीजियेगा: यंहा काम का अर्थ 'काम' नहीं बल्कि कार्य है. वैसे तो काम शर्मा जी का प्रिय कार्य है...भला ये उससे कैसे पीड़ित हो सकते हैं. यदि अभी भी बात आपके पल्ले नहीं पड़ी तो मैं कुछ नहीं कर सकता; हाँ यह सलाह अवश्य दे सकता हूँ की वात्स्यायन कृत कामसूत्र को याद करिए. याद आ गया न? क्या करियेगा इसमें आपका दोष नहीं है; यह तो हमारी मातृभाषा हिंदी की दुर्दशा है. वह दिन दूर नही जब मातृभाषा की ही तरह लोग अपने माँ और बाप को भूल जायेंगे. खैर यंहा इन बातों का कोई औचित्य नहीं है और अलग हम अपने मुद्दे से भटक रहे हैं. 

Friday, October 12, 2012

पुस्तक प्रेम

कहा जाता है की शर्मा जी असीम प्रतिभा के धनी हैं. इनकी क्षमता अपरम्पार है. दीगर हो की इन्होने अपने घर का नाम भी कैलाश पर्वत रखा हुआ है. न जाने ये खुद को समझते क्या है. मुझे तो अभी तक समझ नहीं आया. इस ब्लॉग को पड़कर यदि आपको समझ आ जाये तो मुझे ज़रूर बता दीजियेगा. सच कहता हूँ सदैव आपका आभारी रहूँगा.

जैसा की आप जानते हैं शर्मा जी किसी भी प्रकार की फिल्में देख सकतें है. लेकिन इनकी एक और अभिरुचि के बारे में बताना तो भूल ही गया था. इनके अन्दर एक बहुत ही अच्छा गुण है. इन्हें किताबें पढने का शौक है. यह किसी भी प्रकार की किताब पढ़ लेते हैं -- जीवनी, व्यंग, आलोचना, समालोचना, समीक्षा, लघु कथाएँ, उपन्यास, अनुवादित पुस्तकें, रोमांस, कॉमिक्स, बाल चित्रकथा, इत्यादि इत्यादि. पढने के मामले में इनकी स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे की अंतोन शेखोव द्वारा लिखित लघु कथा "द बेट" के प्रोतागोनिस्ट की थी जिसने

Saturday, September 29, 2012

बिना तडके की दाल

आयातित पत्थर की दिवार पर पहले जंहा चिड़िया की टांग नुमा हैण्ड रायेटिंग में लिखे मेनू से सुसज्जित सफ़ेद बोर्ड टंगा रहता था वंहा अब एक एल सी दी टीवी लटक रही थी. ध्यान देने की बात है की अब पहले की तरह दिवार पर लटकने वाली कई चीज़े अब गायब हो चुकी हैं. अब भगवान् के बड़े बड़े कैलेंडर नजर आते हैं, तो खूंटी से टंगे पटिया वाले अंडर वेअर और ही कमरे की दीवारों पर ठुकी किलों से बंधी हुई डोरी जो कपडे सुखाने के काम आती थी. किन्तु एक रुढ़िवादी की तरह आप हर बदलाव की आलोचना नहीं कर सकते. विगत १५--२० वर्षों में हुए कुछ बदलाव निःसंदेह स्वागत योग्य रहे हैं और उपरोक्त में से अंतिम दो तो बहुत ही ज्यादा. हाँ तो बात टीवी की चल रही थी. यह टीवी विगत दो वर्षो से कैंटीन की दिवार पर टंगी थी, पर उसे अब अपने रंग का जलवा दिखाने का मौका अब मिल रहा था. सरदार को शत शत नमन! २१ सितम्बर का दिन था. शाम के पांच बजे थे. टीवी के पटल पर न्यू ज़ीलैण्ड और बंगलादेश का टी२० का मैच चल रहा था. ऑफिस कैंटीन में बैठे कई लोग चाय नाश्ता कर रहे थे. सबसे अगली और टीवी के करीब की टेबल पर सफाई कर्मचारी और चपरासी बैठे मैच का आनंद ले रहे थे. उनसे कुछ पीछे के टेबल पर कई और लोग दो - चार की संख्या में बैठे चाय की चुस्किओं के साथ आपस में बातें कर रहे थे. कुछ विपरीत लिंगी कोने की टेबल पर आपस में बहुत करीब बैठे तनावपूर्ण मुद्रा में बाते कर रहे थे. प्रतीत हो रहा था वो सहकर्मी कम और प्रेमी ज्यादा थे. लेकिन कुछ युगल ज्यादा खुश थे -- चाय तो घटिया थी पर शायद दोस्त काफी खास था.