Saturday, September 29, 2012

बिना तडके की दाल

आयातित पत्थर की दिवार पर पहले जंहा चिड़िया की टांग नुमा हैण्ड रायेटिंग में लिखे मेनू से सुसज्जित सफ़ेद बोर्ड टंगा रहता था वंहा अब एक एल सी दी टीवी लटक रही थी. ध्यान देने की बात है की अब पहले की तरह दिवार पर लटकने वाली कई चीज़े अब गायब हो चुकी हैं. अब भगवान् के बड़े बड़े कैलेंडर नजर आते हैं, तो खूंटी से टंगे पटिया वाले अंडर वेअर और ही कमरे की दीवारों पर ठुकी किलों से बंधी हुई डोरी जो कपडे सुखाने के काम आती थी. किन्तु एक रुढ़िवादी की तरह आप हर बदलाव की आलोचना नहीं कर सकते. विगत १५--२० वर्षों में हुए कुछ बदलाव निःसंदेह स्वागत योग्य रहे हैं और उपरोक्त में से अंतिम दो तो बहुत ही ज्यादा. हाँ तो बात टीवी की चल रही थी. यह टीवी विगत दो वर्षो से कैंटीन की दिवार पर टंगी थी, पर उसे अब अपने रंग का जलवा दिखाने का मौका अब मिल रहा था. सरदार को शत शत नमन! २१ सितम्बर का दिन था. शाम के पांच बजे थे. टीवी के पटल पर न्यू ज़ीलैण्ड और बंगलादेश का टी२० का मैच चल रहा था. ऑफिस कैंटीन में बैठे कई लोग चाय नाश्ता कर रहे थे. सबसे अगली और टीवी के करीब की टेबल पर सफाई कर्मचारी और चपरासी बैठे मैच का आनंद ले रहे थे. उनसे कुछ पीछे के टेबल पर कई और लोग दो - चार की संख्या में बैठे चाय की चुस्किओं के साथ आपस में बातें कर रहे थे. कुछ विपरीत लिंगी कोने की टेबल पर आपस में बहुत करीब बैठे तनावपूर्ण मुद्रा में बाते कर रहे थे. प्रतीत हो रहा था वो सहकर्मी कम और प्रेमी ज्यादा थे. लेकिन कुछ युगल ज्यादा खुश थे -- चाय तो घटिया थी पर शायद दोस्त काफी खास था.
       प्रेम की अपनी कुछ खामियां होती है. कोई कहता है की प्यार अँधा होता है तो कोई इसे बहरा कहता है. कोई इसे पागलपन तो कोई दीवानगी और खुदगर्जी कहता है. इसके साथ इतने नकरात्मक विशेषण लगे हैं की कभी कभी मुझे ये भारत सरकार लगता है. बेखबर, बेख़ौफ़, बेशर्म, बवासीर. गलत जगह दिल लगा बैठो तो सुना है काफी कष्टकर होता है. खैर जो भी हो किन्तु यह तो है की प्यार में डूबा व्यक्ति, चाहे पुरुष हो या नारी, अपने परिवेश से अपरिचित, अनभिज्ञ होता है. जैसे जैसे प्यार बढता जाता है उसकी दुनिया छोटी होती जाती है. इस पृथकता का अपना ही आनंद है. कैंटीन में कुछ लोग इसी में डूबे 'सोसिअल दिस्कोंनेक्ट'  का मजा ले रहे थे.
      
ऑफिस कैंटीन काफी विशाल थी किन्तु उसमे प्रकाश का समुचित आभाव था. वंही खाने की टेबल के पीछे टेबल टेनिस भी था जंहा दौब्लेस मुकाबले में चार लोग अपने खेल कौशल का जबरदस्त प्रदर्शन कर रहे थे. और बाकी खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. नहीं नहीं ये लोग सुलभ शौचालय के सामने खड़े लोगो की तरह अपनी बारी का इंतज़ार नहीं कर रहे थे. सभी कुर्सियों पर बैठे हुए थे. रौशनी तो कम थी लेकिन इनके उत्साह की कोई कमी थी. पूरा दृश्य 'कैंडल लाइट में टीटी मैच' जैसा था. एक टेबल पर बैठा मैं सोच रहा था की संसाधनों का हवाला देकर काम करने वालों को इनके उत्साह और खेल भावना से प्रेरणा लेनी चाहिए. अगर ये दो चीज़े हमारे पास होती तो शायद हम क्रिकेट के आलावा और कई चीजों में विश्व विजेता होते. लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है.  कुल मिलाजुलाकर कैंटीन के विभिन्न कोनों में एक वृहत रंगमंच की तरह अलहदा दृश्य साथ साथ चल रहे थे. सभी की पठकथा अलग थी और कलाकार भी अलग. कंही नए रिश्ते बन रहे थे तो कंही पुराने रिश्तों से बासीपन के बू रही थी. कंही मैच की सामानांतर कमेन्ट्री चल रही थी तो कही कोई बैठा अपने बॉस को गरिया रहा था. कोई विशुद्ध हवाबाजी कर रहा था -- कंपनी कैसे ज्यादा लाभ कम सकती है, मैनेजमेंट कितना बेवकूफ है, पुराने लोगों ने क्या गलतिया की, और वो उनकी जगह होता तो क्या करता. लेकिन यंहा का सबसे विहंगम दृश्य उस टेबल पर था जंहा शर्मा जी अपने कुछ लुच्चेनुमा सह्कर्मिओं के साथ बैठे हरी चटनी और समोसे का आनंद ले रहे थे. यंहा ध्यान दिलाने वाली बात है की इनमे से कोई भी निर्मल बाबा का भक्त नहीं था. इन्हें बचपन से समोसा प्रिय था और जब भी इन्हें मौका मिलता ये छक कर समोसा खाते थे. खुशियाँ बांटने का और कोई विकल्प भी तो नहीं था इनके पास.
      
यंहा आपसे शर्मा जी का साक्छात्कार कराना अपरिहार्य है. उनका व्यक्तित्व दुर्लभ तो नहीं पर हाँ रोचक ज़रूर है. ये बिलकुल हमारे और शायद आप की तरह आम इन्सान (ध्यान दीजियेगा) है. इनकी भौगोलिक रूप रेखा कुछ इस प्रकार है -- सर पर कुछ काम घनत्व वाले बालों के नीचे चौड़ा ललाट है जिसके ठीक नीचे दो बड़ी बड़ी घूरती कुछ तलाशती निगाहे है जो अपने बीच से एक औसत ऊंचाई वाली नाक के लिए रास्ता छोड़ देती हैं. नाक के ठीक नीचे सवाना घास की तरह रुखी मुछ है, जिनपर शर्मा जी को बहुत घमंड है. कद काठी माध्यम, रंग गेहुँवा, चेहरा थोडा लम्बा, आवाज कुछ पुलिसिया है, ठेठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली. लेकिन इनका व्यक्तित्व कुछ खास है. कहा जाता है की ये किसी भी भाषा की फिल्म देख सकते है -- हिंदी, ओरिया, फ्रेंच, इंग्लिश, मलयालम, या मार्सियन (मंगल ग्रह की) -- और उसे बखूबी समझ सकते है. इनके लिए ऑडियो कोई मायने नहीं रखता...वीडियो ही सब कुछ है. इनकी दूसरी विशेषता यह है की किसी चीज़ का वजन मापने के लिए इन्हें तराजू की आवश्यकता नहीं होती. इनकी आंखे ही काफी है. ये अपनी आँखों से ही बहुत सारा काम कर लेते है. अगर एक्स रे, ऍम आर आई, और अल्ट्रा साउंड का अविष्कार नहीं हुआ होता तो मेडिसिन जगत में इनकी ही आंखे इस्तेमाल की जाती और यह एक करोडपति आदमी होते. लेकिन कुछ कमबख्त वैज्ञानिक इनसे इर्ष्या करते थे...नतीजा तो आपको पता ही है; आज ये ऑफिस में बैठे समोसा खा रहे हैं. शर्मा जी की एक तीसरी विशेषता भी है, कहा जाता है की यदि ये किसी बात से असहमत हो कर मुस्कुरा दें तो अगले की किस्मत का कपाट हमेशा के लिए बंद हो जाता है. इसलिए इन्ही जल्दी कोई नाराज नहीं करता और ये खुद किसी से नाराज़ होते है; काफी प्राग्मैटिक किस्म के जीव है.  
      
शर्मा जी और साथी समोसों पर वैसे ही टूटे हुए थे जैसे की अफ्रीका जंगलों में ३०-४० शिकारी कुत्ते अपने एक लौते शिकार को नोच नोच कर खाते हैं. थाली का दृश्य भयावह था. समोसे छित विछित अवस्था में थे और उनके अन्दर का मसालेदार आलू बाहर थाली पर बिखरा पड़ा था. टेबल का नज़ारा वैसा ही था जैसा एक हवन कुण्ड के आस पास का होता है. कुछ चीजे थाली में थी और कुछ टेबल पर बिखरी पड़ी थी. यथावत, शर्मा जी की निगाहें टीवी के पटल पर चल रहे क्रिकेट मैच पर टिकीं थी और उनका जिज्ञासु मन उनकी जबान को अनाप शनाप प्रश्न करने के लिए उत्प्रेरित कर रहा थाब्रेंडन मक्कुलम जबरदस्त बल्लेबजी कर रहा था. चौका छक्का लगभग हर दुसरे बाल पर लग रहा था. लेकिन जैसे जैसे शाट लगता शर्मा जी की बेचैनी बढती जाती. किसी को कुछ समझ में नहीं रहा था. बंगादेशी बोलर बेअसर हो रहे थे. और शर्मा जी का क्षोभ भी बढ़ता जा राहा था. दो ओवर और पार हो चुके थे. मक्कुलम ८८ के आंकडे पर था और शर्मा जी का पारा १०० डिग्री पर. तभी शकीबुल हसन की बोल पर मक्कुलम इन मिड विकेट पर एक शानदार छका जड़ा...और तभी शर्मा जी के मुंह से निकला, "ये @#$!....के मजाक बना रखा इन लोगो ने...चिअरलीडर्स कहा हैं?" टेबल पर बैठे सभी लोग ठहाके लगा कर हंस पड़े.
मैंने धीरे से कहा, "सर जी, ये बिना तडके की दाल है, मज़ा नहीं आयेगा. चलो."

4 comments:

  1. Sir, ek chhoti si baat ko kahne ke liye poora atmosphere bana dala. Specially Sharmaji ke character par bahut mehnat kee hai.

    Naya Blog, Naya Ishtyle Badhiya Hai...

    ReplyDelete
  2. Jitni tarif kare... utni kam hai...
    शमा॔ जी कोई और नही आप और हम हैं

    This is really really very very good.............. Hat's off to u.:)

    ReplyDelete
  3. sunil bhi kahne mai dam ba ek chhoti si baat ko kha se suru ki use bate ko round and round ker ke ek naye sandesh sab ko dadeya........ jo ki bhut Jabardast hai ape bhut mhane hai or iska jalak dekhe rha hai devo ke dev mhadev ki ape per asine kirpa hai ....... and finaly this sotry is realy tuch to hurt...for this story i say . Hat's off to u.:)and may god bless you my dear brother...ok

    ReplyDelete