आयातित पत्थर की दिवार पर पहले जंहा चिड़िया की टांग नुमा हैण्ड रायेटिंग में लिखे मेनू से सुसज्जित सफ़ेद बोर्ड टंगा रहता था वंहा अब एक एल सी दी टीवी लटक रही थी. ध्यान देने की बात है की अब पहले की तरह दिवार पर लटकने वाली कई चीज़े अब गायब हो चुकी हैं. न अब भगवान् के बड़े बड़े कैलेंडर नजर आते हैं, न तो खूंटी से टंगे पटिया वाले अंडर वेअर और न ही कमरे की दीवारों पर ठुकी किलों से बंधी हुई डोरी जो कपडे सुखाने के काम आती थी. किन्तु एक रुढ़िवादी की तरह आप हर बदलाव की आलोचना नहीं कर सकते. विगत १५--२० वर्षों में हुए कुछ बदलाव निःसंदेह स्वागत योग्य रहे हैं और उपरोक्त में से अंतिम दो तो बहुत ही ज्यादा. हाँ तो बात टीवी की चल रही थी. यह टीवी विगत दो वर्षो से कैंटीन की दिवार पर टंगी थी, पर उसे अब अपने रंग का जलवा दिखाने का मौका अब मिल रहा था. सरदार को शत शत नमन! २१ सितम्बर का दिन था. शाम के पांच बजे थे. टीवी के पटल पर न्यू ज़ीलैण्ड और बंगलादेश का टी२० का मैच चल रहा था. ऑफिस कैंटीन में बैठे कई लोग चाय नाश्ता कर रहे थे. सबसे अगली और टीवी के करीब की टेबल पर सफाई कर्मचारी और चपरासी बैठे मैच का आनंद ले रहे थे. उनसे कुछ पीछे के टेबल पर कई और लोग दो - चार की संख्या में बैठे चाय की चुस्किओं के साथ आपस में बातें कर रहे थे. कुछ विपरीत लिंगी कोने की टेबल पर आपस में बहुत करीब बैठे तनावपूर्ण मुद्रा में बाते कर रहे थे. प्रतीत हो रहा था वो सहकर्मी कम और प्रेमी ज्यादा थे. लेकिन कुछ युगल ज्यादा खुश थे -- चाय तो घटिया थी पर शायद दोस्त काफी खास था.